September 2, 2026

उत्तराखंड में भी नेपाल जैसा खतरा! भिलंगना घाटी के ग्लेशियरों ने बढ़ाई टेंशन, स्टडी में चौंकाने वाले फैक्ट्स आए सामने

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उत्तराखंड ग्लेशियरों पर की गई स्टडी साइंटिस्ट्स की टेंशन बढ़ा रही हैं, जिन्हें भविष्य के लिए अच्छा नहीं माना जा रहा है. रिपोर्ट- नवीन उनियाल-

देहरादून: नेपाल त्रासदी के बाद उत्तराखंड में ग्लेशियर और उनसे बनने वाली झीलों को लेकर सरकार, शासन-प्रशासन और वैज्ञानिक अलर्ट हो गए है. टिहरी जिले में भिलंगना घाटी के छह प्रमुख ग्लेशियरों पर करीब पांच दशक के रिकॉर्ड्स ने कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने लाएं हैं. एक तरफ खतलिंग ग्लेशियर के पिघलने की रफ़्तार ने शोधकर्ताओं को चौंकाया है तो एक दूसरे ग्लेशियर पर बन रही झील वैज्ञानिकों के लिए चिंता का सबब बन गई है. इसी पर ईटीवी भारत की स्पेशल रिपोर्ट…

उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में मौजूद ग्लेशियरों के तेजी से बदलते स्वरूप ने वैज्ञानिकों की टेंशन बढ़ा दी है. भिलंगना घाटी के छह प्रमुख ग्लेशियरों पर करीब पांच दशक तक के रिकॉर्ड्स के अध्ययन में सामने आया है कि साल 1973 से 2025 के बीच इन हिमनदों में लगातार बर्फ और द्रव्यमान का नुकसान हुआ है.

GLOF का खतरा बढ़ा: खास बात यह है कि पिछले एक दशक में ग्लेशियरों के पिघलने और पतले होने की रफ्तार पहले के मुकाबले कई गुना तेज हो गई है. सबसे बड़े खतलिंग ग्लेशियर के करीब 5.33 किलोमीटर पीछे हटने के साथ ही एक अन्य ग्लेशियर के सामने तेजी से विकसित हो रही झील ने भविष्य में संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी जीएलओएफ का खतरा भी बढ़ा दिया है.

यह महत्वपूर्ण शोध Regional Environmental Change जर्नल में 28 अगस्त 2026 को प्रकाशित हुआ है. शोध का शीर्षक Accelerating glacier mass loss in Bhilangana Valley since the 1970 अध्ययन को वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी देहरादून के शोधकर्ता डॉ. राकेश भांबरी और SRF शर्मिष्ठा हलदर ने तैयार किया है.

भिलंगना के 6 बड़े ग्लेशियरों का अध्ययन: वैज्ञानिकों ने भिलंगना घाटी के छह प्रमुख ग्लेशियरों

  • खतलिंग
  • फाटिंग
  • दूधगंगा
  • रतांगरियां
  • जोगिन
  • अनाम ग्लेशियर का अध्ययन किया.

ग्लेशियरों में हुए बड़े बदलाव: ये छह ग्लेशियर भिलंगना घाटी के कुल हिमाच्छादित क्षेत्र के करीब 75 प्रतिशत हिस्से को कवर करते हैं. वैज्ञानिकों ने साल 1973 से 2025 तक के सैटेलाइट आंकड़ों और अलग-अलग समय के डिजिटल एलिवेशन मॉडल यानी DEM का उपयोग कर ग्लेशियरों की ऊंचाई में बदलाव, बर्फ के द्रव्यमान में कमी, क्षेत्रफल और आगे के हिस्से के पीछे हटने का आकलन किया.

भिलंगना घाटी गंगा नदी तंत्र के लिए भी महत्वपूर्ण: भिलंगना नदी भागीरथी की प्रमुख सहायक नदी है और यह क्षेत्र टिहरी जलाशय के लिए भी अहम जल स्रोत है. ग्लेशियरों से निकलने वाला पिघला पानी जलविद्युत उत्पादन, कृषि और निचले इलाकों की बड़ी आबादी के लिए महत्वपूर्ण है. ऐसे में ग्लेशियरों के तेजी से घटने का असर भविष्य की जल उपलब्धता पर पड़ने की आशंका जताई गई है.

खतलिंग ग्लेशियर सबसे ज्यादा पीछे हटा: अध्ययन में सबसे चिंताजनक बदलाव खतलिंग ग्लेशियर में दर्ज किया गया है. गंगोत्री ग्लेशियर के काफी तेजी से पिघलने का रिकॉर्ड पहले भी दर्ज किया गया था, लेकिन अब ग्लेशियर के पिघलने की रफ्तार पहले से ज्यादा दर्ज हुई है.

अलग हो गए फाटिंग ग्लेशियर: साल 1973 से 2024 के बीच खतलिंग ग्लेशियर करीब 5333 मीटर यानी 5.33 किलोमीटर पीछे हट गया. यह भिलंगना घाटी के अध्ययन किए गए ग्लेशियरों में सबसे ज्यादा है. शोध के अनुसार खतलिंग ग्लेशियर साल 2024 तक करीब 10 किलोमीटर लंबा था और यह भिलंगना घाटी का सबसे बड़ा ग्लेशियर है. ग्लेशियर के लगातार पीछे हटने की प्रक्रिया का असर इतना व्यापक रहा कि पहले एक-दूसरे से जुड़े खतलिंग और फाटिंग ग्लेशियर लगभग साल 2000 के आसपास अलग हो गए.

1825 मीटर पीछे हटा फाटिंग ग्लेशियर: फाटिंग ग्लेशियर भी साल 1973 से 2024 के बीच करीब 1825 मीटर पीछे हटा. वैज्ञानिकों के मुताबिक खतलिंग और फाटिंग ग्लेशियरों में लगातार पीछे हटने और बर्फ की मोटाई कम होने की प्रक्रिया लंबे समय से जारी है.

पिछले दशक में कई गुना तेज हुआ बर्फ का नुकसान: अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष ग्लेशियरों के द्रव्यमान में तेजी से हो रही कमी है. वैज्ञानिकों ने तीन अलग-अलग पीरियड 1973-20002000-2014 और 2014-2025 का तुलनात्मक अध्ययन किया. इसमें सामने आया कि खतलिंग और अनाम ग्लेशियर में साल 2014 से 2025 के बीच बर्फ के द्रव्यमान का नुकसान साल 1973 से 2000 की तुलना में करीब चार से पांच गुना तक बढ़ गया.

  • साल 2014-2025 के दौरान खतलिंग ग्लेशियर में औसत वार्षिक द्रव्यमान हानि -0.53 ± 0.02 मीटर वॉटर इक्विवेलेंट प्रति वर्ष दर्ज की गई.
  • वहीं अनाम ग्लेशियर में यह नुकसान सबसे अधिक -0.92 ± 0.09 मीटर वॉटर इक्विवेलेंट प्रति वर्ष रहा.
  • अन्य ग्लेशियरों में भी हाल के दशक में तेजी से द्रव्यमान हानि देखी गई.
  • दूधगंगा ग्लेशियर में 2014-2025 के दौरान औसत वार्षिक हानि -0.88 ± 0.03 मीटर.
  • फाटिंग में -0.52 ± 0.03 मीटर
  • रतांगरियां में –0.29 ± 0.05 मीटर
  • जोगिन ग्लेशियर में -0.34 ± 0.04 मीटर वॉटर इक्विवेलेंट प्रति वर्ष दर्ज की गई.

रतांगरियां और जोगिन ग्लेशियर की भी रप्तार बढ़ी: वहीं साल 2000 से 2014 के बीच रतांगरियां और जोगिन ग्लेशियर में मामूली मोटाई बढ़ने के संकेत मिले थे, लेकिन साल 2014 के बाद इन दोनों में भी द्रव्यमान हानि की रफ्तार बढ़ गई. यानी हाल के दशक में अध्ययन किए गए सभी छह ग्लेशियरों में बर्फ के नुकसान का दबाव बढ़ा है.

क्षेत्रफल भी लगातार घट रहा: वैज्ञानिकों के अनुसार साल 1973 से 2024 के बीच सभी छह ग्लेशियरों के क्षेत्रफल में कमी दर्ज की गई. सबसे ज्यादा क्षेत्रफल नुकसान

  • खतलिंग ग्लेशियर में करीब 2.79 वर्ग किलोमीटर हुआ.
  • इसके बाद फाटिंग ग्लेशियर में करीब 0.71 वर्ग किलोमीटर
  • दूधगंगा में 0.64 वर्ग किलोमीटर
  • अनाम ग्लेशियर में करीब 0.50 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल की कमी दर्ज की गई.
  • रतांगरियां ग्लेशियर में करीब 0.23 वर्ग किलोमीटर
  • जोगिन ग्लेशियर में करीब 0.35 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल घटा.

ग्लेशियरों के ऊपरी हिस्सों पर भी पड़ रहा असर: अध्ययन बताता है कि ग्लेशियरों में बदलाव केवल उनके अंतिम छोर तक सीमित नहीं है. हाल के वर्षों में बर्फ की सतह पतली होने का असर ग्लेशियरों के ऊपरी हिस्सों तक पहुंच रहा है, जिन्हें सामान्य तौर पर बर्फ जमा होने वाला क्षेत्र माना जाता है.

अनाम ग्लेशियर के सामने बनी झील नई चिंता: अध्ययन में सबसे बड़ी चिंता एक अनाम झील समाप्ति वाले ग्लेशियर को लेकर भी जताई गई है. यह ग्लेशियर वर्ष 1973 से 2024 के बीच करीब 760 मीटर पीछे हटा. लगातार बर्फ पिघलने और ग्लेशियर के पीछे हटने से इसके सामने एक प्रोग्लेशियल झील (ऐसी ग्लेशियर निर्मित झील (proglacial lake) में जाकर समाप्त होता है जिसका कोई आधिकारिक नाम नहीं होता) विकसित हुई है.

0.36 वर्ग किलोमीटर हो गया झील का क्षेत्रफल: शोध के अनुसार साल 2024 तक इस झील का क्षेत्रफल करीब 0.36 वर्ग किलोमीटर हो गया था. वैज्ञानिकों ने इसे संभावित रूप से खतरनाक माना है. हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के सामने तेजी से बनने या बढ़ने वाली झीलें भविष्य में जीएलओएफ का कारण बन सकती हैं.

जीएलओएफ यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड उस स्थिति को कहा जाता है, जब ग्लेशियर से बनी झील को रोकने वाली प्राकृतिक संरचना टूट जाती है और बड़ी मात्रा में पानी, मलबा और पत्थर अचानक नीचे की घाटी की ओर बहने लगते हैं. पर्वतीय क्षेत्रों में ऐसी घटनाएं सड़क, पुल, गांव और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए बड़ा खतरा बन सकती हैं.

तापमान बढ़ने और बारिश के पैटर्न में बदलाव का असर: सामान्यतौर पर ग्लेशियरों में तेजी से हो रहे बदलाव के पीछे बढ़ते तापमान और मानसूनी पैटर्न में बदलाव को प्रमुख कारणों में शामिल किया है. वैज्ञानिकों के अनुसार मध्य हिमालय में बढ़ता तापमान और वर्षा के स्वरूप में बदलाव ग्लेशियरों के द्रव्यमान नुकसान को बढ़ा रहा है.

अध्ययन में यह भी उल्लेख किया गया है कि कुछ क्षेत्रों में ठोस हिमपात की जगह तरल वर्षा की प्रवृत्ति बढ़ने से ग्लेशियरों के निचले हिस्सों पर पिघलने का दबाव बढ़ सकता है. खासकर कम ऊंचाई पर समाप्त होने वाले ग्लेशियर अपेक्षाकृत अधिक प्रभावित हो रहे हैं. रतांगरियां और जोगिन ग्लेशियर अपेक्षाकृत अधिक ऊंचाई पर स्थित हैं.

इन दोनों ग्लेशियरों के बड़े हिस्से बर्फ जमा होने वाले क्षेत्र में आते हैं, जिसके कारण कुछ समय तक इनमें अपेक्षाकृत स्थिरता देखने को मिली, लेकिन हालिया अध्ययन अवधि में इन ग्लेशियरों में भी द्रव्यमान हानि बढ़ना भविष्य के लिए चेतावनी है.

टिहरी जलाशय और जल सुरक्षा से जुड़ा है मामला: भिलंगना घाटी के ग्लेशियरों का महत्व केवल हिमालयी पारिस्थितिकी तक सीमित नहीं है. यह क्षेत्र भागीरथी नदी तंत्र और टिहरी जलाशय से जुड़ा हुआ है. ग्लेशियरों से निकलने वाला पानी स्थानीय नदी प्रणाली, कृषि और जलविद्युत उत्पादन में योगदान देता है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि शुरुआती दौर में तेजी से ग्लेशियर पिघलने से नदियों में पानी की मात्रा बढ़ सकती है, लेकिन लंबे समय में लगातार सिकुड़ते ग्लेशियर प्राकृतिक जल भंडार को कमजोर कर सकते हैं. इसका असर भविष्य में विशेष रूप से सूखे मौसम के दौरान पानी की उपलब्धता पर पड़ सकता है.

लगातार निगरानी की जरूरत: वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष में कहा है कि भिलंगना घाटी के ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव एक समान नहीं हैं. हर ग्लेशियर की ऊंचाई, ढलान, आकार, दिशा और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियां उसकी प्रतिक्रिया को प्रभावित करती हैं. इसके बावजूद सभी छह ग्लेशियरों में हाल के वर्षों में बढ़ती द्रव्यमान हानि एक स्पष्ट चेतावनी है.

अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की निरंतर निगरानी अब बेहद जरूरी हो गई है. विशेष रूप से उन ग्लेशियरों पर नजर रखने की जरूरत है, जिनके सामने तेजी से झीलों का निर्माण हो रहा है.

भिलंगना बेसिन के छह ग्लेशियरों पर करीब पांच दशक के आंकड़ों से तैयार यह शोध उत्तराखंड के लिए एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक चेतावनी है. खतलिंग ग्लेशियर का 5 किलोमीटर से अधिक पीछे हटना, हाल के दशक में कई गुना बढ़ी बर्फ की हानि और नई ग्लेशियल झील का विकसित होना साफ संकेत है कि हिमालय में बदलाव की रफ्तार तेज हो रही है.

ऐसे में वैज्ञानिक निगरानी, जोखिम मैपिंग और समय रहते चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना भविष्य की जल सुरक्षा और हिमालयी आपदाओं से बचाव के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा. शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन 2025 जनवरी से शुरू किया और अगस्त महीने में इस शोध के काम को पूरा किया गया.

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